14/11/2025
Part-2 चंद्रम भारी मन से #दुकान पहुँचा। उसके पैर #ज़मीन पर नहीं, बल्कि हवा में चल रहे थे, जैसे वह किसी अजीब सपने के बीच हो। दुकान में कदम रखते ही उसने देखा कि सेठजी पहले से ही गद्दी पर बैठे थे और हिसाब-किताब में व्यस्त थे। उनके चेहरे पर वही शांत, गंभीर भाव था जो चंद्रम ने घर के दरवाज़े पर देखा था।
चंद्रम ने हिम्मत जुटाकर कहा, “सेठजी, मैं आ गया।”
सेठजी ने हिसाब से नज़रें हटाए बिना एक संक्षिप्त 'हूँ' कहा। यह पहली बार था जब ब्रीफकेस सौंपने के बाद चंद्रम और सेठजी एक ही दिन इतनी जल्दी आमने-सामने थे। चंद्रम का मन बेचैन था। वह उम्मीद कर रहा था कि सेठजी कोई गुस्सा दिखाएँगे, कोई सवाल करेंगे, या कम से कम अपनी मालकिन के अचानक बाहर जाने का कोई कारण बताएँगे। लेकिन यह खामोशी चंद्रम को सबसे ज़्यादा डरा रही थी। यह उस तूफान के पहले की शांति थी जिसके आने का इंतज़ार सबको होता है।
अगले दिन से, चंद्रम ने हर दोपहर की तरह ब्रीफकेस लिया और उसे वापस सेठजी को दुकान पर ही सौंप दिया। यह प्रक्रिया बिल्कुल यांत्रिक (mechanical) थी—जैसे कोई पुर्ज़ा अपनी नियत जगह पर वापस रख दिया गया हो। सेठजी ब्रीफकेस लेते, उसे एक तरफ रखते और अपनी दिनचर्या में लग जाते। उन्होंने एक बार भी न तो मालकिन का ज़िक्र किया, न ही चंद्रम से कोई अतिरिक्त बात की।
चार महीने की अंतरंगता के बाद, यह अचानक आया बदलाव चंद्रम के लिए एक मानसिक कारावास बन गया था। उसे दुकान का हर मिनट पहाड़ जैसा लग रहा था। उसकी आँखें बार-बार सेठजी पर टिक जाती थीं, यह जानने के लिए कि क्या उनके चेहरे पर कोई शिकन है, क्या उनकी आवाज़ में कोई सख्ती है। लेकिन सेठजी की गंभीरता अटल थी।
एक हफ़्ते बाद, जब ब्रीफकेस वापस करने का समय हुआ, तो चंद्रम ने अपनी बेचैनी पर काबू न पा सकने के कारण हिम्मत की।
“सेठजी,” चंद्रम ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “मालकिन कैसी हैं? क्या वह बाहर से लौट आईं?”
सेठजी ने चश्मा उतारा, मेज पर रखा और अपनी नज़रें सीधी चंद्रम की आँखों में डालीं। वह नज़र इतनी ठहरी हुई थी कि चंद्रम की धड़कनें रुक गईं।
“वह... अब वापस नहीं आएँगी,” सेठजी ने कहा। उनकी आवाज़ में न गुस्सा था, न दुख, बल्कि एक अजीब थकान थी।
चंद्रम के होंठ सूखे, “क्या... क्या हो गया सेठजी?”
सेठजी हल्के से मुस्कुराए—एक ऐसी मुस्कान जो अंदर के गहरे घाव को छिपा रही थी।
“कुछ नहीं हुआ, चंद्रम। सब कुछ हो चुका है,” सेठजी ने जवाब दिया।
वह उठे और ब्रीफकेस का ताला खोला। उन्होंने एक लिफाफा निकाला और उसे चंद्रम की ओर बढ़ा दिया।
“यह तुम्हारा हिसाब है। पिछले चार महीनों में तुमने जो 'अतिरिक्त काम' किया, उसका मेहनताना इसमें है। इसमें तुम्हारी एक महीने की तनख्वाह भी ज़्यादा है—मेरी तरफ से छुट्टी।”
चंद्रम भौंचक्का रह गया। उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। यह हिसाब, यह पैसा, यह सब उस समझौते का हिस्सा था जिसे उसने कभी समझा ही नहीं था।
“सेठजी, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। आप... आप यह क्या कह रहे हैं?” चंद्रम की आवाज़ काँप रही थी।
सेठजी वापस कुर्सी पर बैठ गए और बड़े इत्मीनान से बोले, “चंद्रम, तुमने एक चीज़ नहीं समझी। यह ब्रीफ़केस गोपनीय क्यों था? इसका वज़न कभी नहीं बदलता था। तुम जब भी इसे लेकर घर जाते, यह हमेशा खाली होता था, है ना?”
चंद्रम को पिछले चार महीनों की हर मुलाकात, हर भागदौड़ याद आ गई। हाँ, ब्रीफकेस हमेशा बहुत हल्का होता था।
सेठजी ने आगे कहा, “मालकिन और मैं... हम पिछले कई महीनों से तलाक के लिए तैयार हो रहे थे। हमारा रिश्ता खत्म हो चुका था। लेकिन हमारे बीच एक भावनात्मक दूरी थी जिसे मैं भर नहीं पा रहा था। वह अटेंशन चाहती थीं, चंद्रम, और वह चाहती थीं कि मैं ईर्ष्या महसूस करूँ। उन्हें मेरे उदास होने की ज़रूरत थी।”
सेठजी ने मेज पर हाथ मारा।
“मैंने तुम्हें देखा। तुम एक युवा, अविवाहित, और आकर्षक लड़के हो। मुझे पता था कि तुम मेरी मालकिन के सौंदर्य से बच नहीं पाओगे। मैंने यह खेल शुरू किया।”
चंद्रम को लगा जैसे किसी ने उसे थप्पड़ मारा हो। वह ब्रीफकेस, उसकी हर दोपहर की भाग-दौड़, वह अंतरंग स्पर्श—सब एक सुनियोजित नाटक था।
सेठजी ने उदास आँखों से देखा, “वह चार महीने, मेरे लिए एक जरूरी समय था। वह भावनात्मक रूप से तैयार हो रही थीं, और मैं मानसिक रूप से दूर हो रहा था। तुम्हारी हर मुलाकात, हर चुंबन, मुझे आज़ाद कर रहा था। उस ब्रीफ़केस में कोई राज़ नहीं था, चंद्रम। राज तो मेरी और मालकिन के रिश्ते में था।”
सेठजी खड़े हो गए।
“कल उन्होंने तलाक के कागज़ात पर दस्तखत कर दिए और आज वह शहर छोड़कर जा चुकी हैं। अब यह नाटक समाप्त। अब न ब्रीफ़केस घर जाएगा, न तुम्हें जाना है।”
सेठजी ने एक गहरी साँस ली।
“तुमने मेरी मदद की, चंद्रम। अनजाने में ही सही। यह लिफ़ाफ़ा ले लो। और सुनो... अब दुकान पर भी तुम्हारी ज़रूरत नहीं है। तुम आज़ाद हो।”
चंद्रम के हाथ में लिफाफा था, लेकिन उसका दिमाग सुन्न था। वह प्रेम जिसे उसने अपना मान लिया था, वह असल में किसी और की कहानी का एक छोटा, इस्तेमाल किया हुआ पन्ना था। वह उठकर खड़ा हुआ और बिना कुछ कहे, सिर झुकाकर दुकान से बाहर निकल गया।
अब उसके पास पैसे थे, लेकिन उसके मन में एक भयानक खालीपन था। वह उस ब्रीफकेस को देखता रहा, जो अब दुकान पर पड़ा हुआ था, एक भूल चुकी हुई निशानी की तरह। उसे एहसास हुआ कि सेठजी शांत इसलिए थे, क्योंकि उन्होंने जीत हासिल कर ली थी।
क्या आप जानना चाहेंगे कि चंद्रम इस सदमे के बाद अपनी ज़िंदगी में क्या मोड़ लेता है? 💘💘💘💘💘💘💘💘