भाभी की कहानी

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Part-2  चंद्रम भारी मन से  #दुकान पहुँचा। उसके पैर  #ज़मीन पर नहीं, बल्कि हवा में चल रहे थे, जैसे वह किसी अजीब सपने के ब...
14/11/2025

Part-2 चंद्रम भारी मन से #दुकान पहुँचा। उसके पैर #ज़मीन पर नहीं, बल्कि हवा में चल रहे थे, जैसे वह किसी अजीब सपने के बीच हो। दुकान में कदम रखते ही उसने देखा कि सेठजी पहले से ही गद्दी पर बैठे थे और हिसाब-किताब में व्यस्त थे। उनके चेहरे पर वही शांत, गंभीर भाव था जो चंद्रम ने घर के दरवाज़े पर देखा था।
​चंद्रम ने हिम्मत जुटाकर कहा, “सेठजी, मैं आ गया।”
​सेठजी ने हिसाब से नज़रें हटाए बिना एक संक्षिप्त 'हूँ' कहा। यह पहली बार था जब ब्रीफकेस सौंपने के बाद चंद्रम और सेठजी एक ही दिन इतनी जल्दी आमने-सामने थे। चंद्रम का मन बेचैन था। वह उम्मीद कर रहा था कि सेठजी कोई गुस्सा दिखाएँगे, कोई सवाल करेंगे, या कम से कम अपनी मालकिन के अचानक बाहर जाने का कोई कारण बताएँगे। लेकिन यह खामोशी चंद्रम को सबसे ज़्यादा डरा रही थी। यह उस तूफान के पहले की शांति थी जिसके आने का इंतज़ार सबको होता है।
​अगले दिन से, चंद्रम ने हर दोपहर की तरह ब्रीफकेस लिया और उसे वापस सेठजी को दुकान पर ही सौंप दिया। यह प्रक्रिया बिल्कुल यांत्रिक (mechanical) थी—जैसे कोई पुर्ज़ा अपनी नियत जगह पर वापस रख दिया गया हो। सेठजी ब्रीफकेस लेते, उसे एक तरफ रखते और अपनी दिनचर्या में लग जाते। उन्होंने एक बार भी न तो मालकिन का ज़िक्र किया, न ही चंद्रम से कोई अतिरिक्त बात की।
​चार महीने की अंतरंगता के बाद, यह अचानक आया बदलाव चंद्रम के लिए एक मानसिक कारावास बन गया था। उसे दुकान का हर मिनट पहाड़ जैसा लग रहा था। उसकी आँखें बार-बार सेठजी पर टिक जाती थीं, यह जानने के लिए कि क्या उनके चेहरे पर कोई शिकन है, क्या उनकी आवाज़ में कोई सख्ती है। लेकिन सेठजी की गंभीरता अटल थी।
​एक हफ़्ते बाद, जब ब्रीफकेस वापस करने का समय हुआ, तो चंद्रम ने अपनी बेचैनी पर काबू न पा सकने के कारण हिम्मत की।
​“सेठजी,” चंद्रम ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “मालकिन कैसी हैं? क्या वह बाहर से लौट आईं?”
​सेठजी ने चश्मा उतारा, मेज पर रखा और अपनी नज़रें सीधी चंद्रम की आँखों में डालीं। वह नज़र इतनी ठहरी हुई थी कि चंद्रम की धड़कनें रुक गईं।
​“वह... अब वापस नहीं आएँगी,” सेठजी ने कहा। उनकी आवाज़ में न गुस्सा था, न दुख, बल्कि एक अजीब थकान थी।
​चंद्रम के होंठ सूखे, “क्या... क्या हो गया सेठजी?”
​सेठजी हल्के से मुस्कुराए—एक ऐसी मुस्कान जो अंदर के गहरे घाव को छिपा रही थी।
​“कुछ नहीं हुआ, चंद्रम। सब कुछ हो चुका है,” सेठजी ने जवाब दिया।
​वह उठे और ब्रीफकेस का ताला खोला। उन्होंने एक लिफाफा निकाला और उसे चंद्रम की ओर बढ़ा दिया।
​“यह तुम्हारा हिसाब है। पिछले चार महीनों में तुमने जो 'अतिरिक्त काम' किया, उसका मेहनताना इसमें है। इसमें तुम्हारी एक महीने की तनख्वाह भी ज़्यादा है—मेरी तरफ से छुट्टी।”
​चंद्रम भौंचक्का रह गया। उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। यह हिसाब, यह पैसा, यह सब उस समझौते का हिस्सा था जिसे उसने कभी समझा ही नहीं था।
​“सेठजी, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। आप... आप यह क्या कह रहे हैं?” चंद्रम की आवाज़ काँप रही थी।
​सेठजी वापस कुर्सी पर बैठ गए और बड़े इत्मीनान से बोले, “चंद्रम, तुमने एक चीज़ नहीं समझी। यह ब्रीफ़केस गोपनीय क्यों था? इसका वज़न कभी नहीं बदलता था। तुम जब भी इसे लेकर घर जाते, यह हमेशा खाली होता था, है ना?”
​चंद्रम को पिछले चार महीनों की हर मुलाकात, हर भागदौड़ याद आ गई। हाँ, ब्रीफकेस हमेशा बहुत हल्का होता था।
​सेठजी ने आगे कहा, “मालकिन और मैं... हम पिछले कई महीनों से तलाक के लिए तैयार हो रहे थे। हमारा रिश्ता खत्म हो चुका था। लेकिन हमारे बीच एक भावनात्मक दूरी थी जिसे मैं भर नहीं पा रहा था। वह अटेंशन चाहती थीं, चंद्रम, और वह चाहती थीं कि मैं ईर्ष्या महसूस करूँ। उन्हें मेरे उदास होने की ज़रूरत थी।”
​सेठजी ने मेज पर हाथ मारा।
​“मैंने तुम्हें देखा। तुम एक युवा, अविवाहित, और आकर्षक लड़के हो। मुझे पता था कि तुम मेरी मालकिन के सौंदर्य से बच नहीं पाओगे। मैंने यह खेल शुरू किया।”
​चंद्रम को लगा जैसे किसी ने उसे थप्पड़ मारा हो। वह ब्रीफकेस, उसकी हर दोपहर की भाग-दौड़, वह अंतरंग स्पर्श—सब एक सुनियोजित नाटक था।
​सेठजी ने उदास आँखों से देखा, “वह चार महीने, मेरे लिए एक जरूरी समय था। वह भावनात्मक रूप से तैयार हो रही थीं, और मैं मानसिक रूप से दूर हो रहा था। तुम्हारी हर मुलाकात, हर चुंबन, मुझे आज़ाद कर रहा था। उस ब्रीफ़केस में कोई राज़ नहीं था, चंद्रम। राज तो मेरी और मालकिन के रिश्ते में था।”
​सेठजी खड़े हो गए।
​“कल उन्होंने तलाक के कागज़ात पर दस्तखत कर दिए और आज वह शहर छोड़कर जा चुकी हैं। अब यह नाटक समाप्त। अब न ब्रीफ़केस घर जाएगा, न तुम्हें जाना है।”
​सेठजी ने एक गहरी साँस ली।
​“तुमने मेरी मदद की, चंद्रम। अनजाने में ही सही। यह लिफ़ाफ़ा ले लो। और सुनो... अब दुकान पर भी तुम्हारी ज़रूरत नहीं है। तुम आज़ाद हो।”
​चंद्रम के हाथ में लिफाफा था, लेकिन उसका दिमाग सुन्न था। वह प्रेम जिसे उसने अपना मान लिया था, वह असल में किसी और की कहानी का एक छोटा, इस्तेमाल किया हुआ पन्ना था। वह उठकर खड़ा हुआ और बिना कुछ कहे, सिर झुकाकर दुकान से बाहर निकल गया।
​अब उसके पास पैसे थे, लेकिन उसके मन में एक भयानक खालीपन था। वह उस ब्रीफकेस को देखता रहा, जो अब दुकान पर पड़ा हुआ था, एक भूल चुकी हुई निशानी की तरह। उसे एहसास हुआ कि सेठजी शांत इसलिए थे, क्योंकि उन्होंने जीत हासिल कर ली थी।

​क्या आप जानना चाहेंगे कि चंद्रम इस सदमे के बाद अपनी ज़िंदगी में क्या मोड़ लेता है? 💘💘💘💘💘💘💘💘






 #दरवाज़ा खोलते ही उसे जो पहला  #दृश्य दिखा, उसने उसकी रूह तक झकझोर दी।पत्नी मीरा लिविंग रूम में खड़ी थी—अजीब-सी घबराहट ...
14/11/2025

#दरवाज़ा खोलते ही उसे जो पहला #दृश्य दिखा, उसने उसकी रूह तक झकझोर दी।
पत्नी मीरा लिविंग रूम में खड़ी थी—अजीब-सी घबराहट में, कुर्ती उल्टी पहनी हुई, माथे पर पसीना… और उसकी आँखें ऐसे फैल गईं मानो कोई बड़ा राज दबाना चाहती हो।

वह तीन दिन पहले ही बिज़नेस ट्रिप पर गया था।
पर आज अचानक काम खत्म होते ही बिना बताए लौट आया था।

पत्नी को ऐसे देखकर उसका दिल धक से रह गया।
आख़िर मीरा इतनी परेशान क्यों है? उल्टी ड्रेस क्यों पहनी है? और घर में यह अजीब-सी चुप्पी क्यों है?

उसने रुककर धीरे से पूछा
“मीरा… ये क्या हाल है? सब ठीक तो है?”

मीरा की उंगलियाँ काँपने लगीं।
वह कुछ कहना चाहती थी… पर आवाज़ नहीं निकल रही थी
वह घर में आगे बढ़ा तो उसे एक और चीज़ अजीब लगी
टेबल पर दो ग्लास पड़े थे।
एक में पानी भरकर रखा था… दूसरे में सिर्फ कुछ बूंदें।

उसके दिमाग में शक के बादल उमड़ पड़े।
वह मुड़ा और मीरा की आँखों में देखने लगा
“कोई आया था…?”

मीरा ने झट से नज़रें झुका लीं।
उसकी साँसें तेज़ हो गईं।

वह बुरी तरह टूटने लगा।

मीरा चुप थी, बिल्कुल चुप।
उसी चुप्पी ने उसके भीतर आग लगा दी।

“मीरा, साफ़-साफ़ बताओ! उल्टी ड्रेस, दो ग्लास… ये सब क्या है?”

मीरा के गले से घुटी हुई आवाज़ निकली
“कृपया… पहले बैठिए… मैं सब बताऊँगी…”

वह और गुस्से से भर गया।
“अभी बताओ!”

मीरा की आँखों से आँसू टपकने लगे।
“डर लग रहा है…”

“किससे?”

“आपसे…”

उसका गुस्सा अब शक में बदल चुका था।
वह मीरा को किनारे करते हुए बेडरूम की ओर बढ़ने लगा।

मीरा पीछे-पीछे भागी
“रुको! प्लीज़ रुको!”

पर वह उसकी बात सुनने की हालत में नहीं था।
दिल में सिर्फ एक ही डर था—
क्या मीरा ने…?

कमरे का दरवाज़ा उसने झटके से खोला।

लेकिन…
अंदर कोई नहीं था।

बस बिखरा हुआ सामान…
और फर्श पर पड़े तीन-चार दवाई के खाली रैपर।

उसने रैपर उठाया
उन पर लिखा था: “हाई ब्लड प्रेशर — इमरजेंसी डोज़”

वह चौंक गया।
“ये क्या है?”

मीरा ने धीरे से कहा
“कृपया… पहले बैठ जाइए… आपको लगा जैसा कुछ नहीं है…”

वह वहीं बिस्तर पर बैठ गया थोड़ा थका हुआ, थोड़ा टूटा हुआ, थोड़ा डरा हुआ।

“अब बताओ… उल्टी ड्रेस क्यों?”

मीरा उसके सामने बैठी।
उसके हाथ काँप रहे थे।

“आप तीन दिन बाहर थे…”

वह सिर हिलाकर सुन रहा था।

“कल शाम को… मैं अचानक बेहोश हो गई।”

उसके चेहरे पर चिंता उभर आई
“क्या? कब?!”

मीरा बोली
“नहीं बताना चाहती थी… आपको परेशान नहीं करना चाहती थी।”

उसकी आँखें भर आईं।

“नीचे वाली पड़ोसन सीमा मुझे अस्पताल लेकर गई।
वहीं से लौटकर मैंने जल्दी-जल्दी कपड़े बदले… शायद इसी जल्दबाज़ी में कुर्ती उल्टी रह गई।”

उसका दिल धक से गिरा
“अस्पताल? अचानक क्यों?”

मीरा ने आँसू पोंछते हुए कहा
“डॉक्टर बोले कि… आपकी काम की टेंशन ने मेरी सेहत पर असर डाला है।
ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ गया था।
मुझे लगा… आप पर बोझ न डालूँ, इसलिए बताया नहीं।”

“और ये दो ग्लास?”

मीरा ने धीरे से जवाब दिया
“सीमा पानी पिलाकर गई थी।”

उसका सिर झुक गया
उसे शर्म महसूस हुई।

“और अगर इतना ही था…
तो तुम रो क्यों रही हो?”

मीरा फूटकर रो पड़ी।

“क्योंकि…”

“क्योंकि क्या?”

मीरा ने काँपती आवाज़ में कहा
“क्योंकि मैंने आज डॉक्टर की रिपोर्ट भी देखी… और मुझे लगा आप पर भारी पड़ जाएगी।”

“रिपोर्ट?”

मीरा ने बिस्तर के पास रखी फ़ाइल उठाई और उसे थमा दी।
उसके हाथ काँप रहे थे जब उसने पन्ना खोला।

और वह पत्थर बन गया।

रिपोर्ट में साफ़ लिखा था
“मीरा—दो महीने की गर्भवती।”

उसकी आँखें फैल गईं
“ये… ये कैसे…?”

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया
“डॉक्टर का कहना है कि यह एक चमत्कार है…
हमने उम्मीद ही छोड़ दी थी।”

वह पागलों की तरह मीरा को देखता रह गया।
गुस्सा, शक, टूटन—सब गायब हो गया।

“मीरा… तुम अकेले यह सब झेल रही थी?”

मीरा ने रोते हुए कहा
“मैं तुम्हें खुश करना चाहती थी…
सही पल पर बताना चाहती थी…
लेकिन आज… अपनी उल्टी ड्रेस की वजह से तुम डर गए।”

वह उसके सामने झुक गया, उसका हाथ पकड़कर
“नहीं मीरा… मुझे माफ़ कर दो।
मैंने तुम्हारी घबराहट को गलत समझा।
तुम्हें अकेला छोड़ना मेरी गलती थी, शक करना उससे भी बड़ी।”

मीरा ने रुँधे गले से कहा
“मैं डर गई थी कि कहीं तुम फिर दुखी न हो जाओ…”

वह मुस्कुराते हुए आँसू पोंछने लगा
“तुम और बच्चा… मेरे लिए दुनिया से बड़ा सुख है।”

मीरा उससे लिपट गई।
दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे
एक तरफ़ का डर…
दूसरी तरफ़ का प्यार।

वह बोला
“अब से कुछ भी छुपाना नहीं।”

मीरा ने सिर हिलाया
“नहीं… अब से सब साथ में।”

वह उसे अपनी बाँहों में लेकर बोला
“मीरा… उल्टी ड्रेस, दो ग्लास, बिखरा कमरा
कुछ भी मायने नहीं रखता।
तुम ठीक हो,
हमारा बच्चा ठीक है
बस यही काफी है।”

मीरा हल्की मुस्कान के साथ बोली
“डर तो बहुत लग रहा था…”

वह हँसते हुए बोला
“अब मैं हूँ न…
हम दोनों मिलकर हर डर का सामना करेंगे।”

और उस पल,
उन दोनों की दुनिया में
सिर्फ़ राहत, प्यार
और एक नई शुरुआत की धड़कनें गूँज रही थीं।

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क्या आपका किसी ने चाँटा है, अगर हाँ तो किसने 🤔🤔कैसा फ़िल होता है 🥰🥰🥰
20/10/2025

क्या आपका किसी ने चाँटा है, अगर हाँ तो किसने 🤔🤔
कैसा फ़िल होता है 🥰🥰🥰

कैसी लग रही हूँ ❤
05/10/2025

कैसी लग रही हूँ ❤

 #रात को बिस्तर पर आते है,, रातभर मुझे सोने नहीं देते,, कमरे में बिस्तर पर गंदा काम करना ही शादी है क्या,,,हमारी शादी को...
05/10/2025

#रात को बिस्तर पर आते है,, रातभर मुझे सोने नहीं देते,, कमरे में बिस्तर पर गंदा काम करना ही शादी है क्या,,,

हमारी शादी को दस साल हो गए, पर तुम्हें मेरी भावनाओं की कोई कद्र ही नहीं। न रोमांस बचा है, न मज़ाक। बस तुम और तुम्हारा अखबार, टीवी, और मोबाइल!"

रघु ने चाय की चुस्की ली और एक मुस्कान फेंकते हुए कहा,
"अच्छा! तो ये बताओ, रोमांस के लिए तुम्हें कब वक्त मिलता है? सुबह किचन में किलेबंदी चलती है, दोपहर बच्चों के होमवर्क का महायुद्ध, और रात को तुम खुद नींद के गहरे समुद्र में डूब जाती हो। अब बताओ, रोमांस कहाँ से आए?"

उसके इस जवाब ने मुझे और चिढ़ा दिया। मैंने तुरंत कहा,
"तो क्या ये सब मेरी ही गलती है? मैं तो बस इतना चाहती हूं कि तुम थोड़ा वक्त निकालो, मुझे महसूस कराओ कि मैं सिर्फ इस घर की 'मैनेजर' नहीं, तुम्हारी पत्नी भी हूं। प्यार और सम्मान से भरा रिश्ता चाहिए, न कि सिर्फ जिम्मेदारियों का गठबंधन।"

रघु ने अखबार एक तरफ रखा और अपनी खास शैली में जवाब दिया,
"अच्छा, तो क्या मैं हर रोज़ तुम्हारे लिए कविता लिखूं या सुबह-सुबह तुम्हें फ़िल्मी हीरो की तरह गोद में उठा लूं? अब सच बताओ, अगर मैंने ऐसा किया, तो तुम कहोगी, ‘रघु, बच्चों के सामने ये सब मत करो!’"

उसकी बातों का ये अंदाज़ मुझे और खीझा गया। मैंने तुनककर कहा,
"तुम हर बात में मज़ाक क्यों करते हो? मैंने तो बस कहा कि अब वो गर्मजोशी हमारे रिश्ते से गायब है। तुम्हारा हर स्पर्श जो कभी एक कहानी कहता था, अब वो सब औपचारिक हो गया है।"

इस बार रघु थोड़ा गंभीर हुआ। उसने मेरी आंखों में देखा और नरम आवाज़ में बोला,
"देखो, काव्या। प्यार तब भी था और अब भी है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले हम इसे दिखाने में उत्सुक थे, अब इसे निभाने में। तुमसे मेरा प्यार कभी कम नहीं हुआ। मैं आज भी तुम्हारे लिए उतना ही दीवाना हूं, जितना पहले था। बस जिंदगी की जिम्मेदारियां बीच में आ गई हैं।"

उसकी बातों ने मुझे थोड़ा नरम किया, लेकिन मैंने फिर भी छेड़ते हुए कहा,
"अगर ऐसा है, तो कभी-कभी वही पुराने रघु बनकर मुझे छेड़ दो। वो तुम्हारी शरारती आंखें और वो मासूमियत... वो सब वापस लाओ।"

रघु ने शरारती लहजे में कहा,
"अच्छा! तो ये बात है। सुनो, आज रात बच्चों को जल्दी सुला देना। फिर देखो तुम्हारे पुराने रघु में कितनी ताकत बची है!"

मैं शर्माते हुए बोली,
"हट! मैं तुमसे कुछ कह रही हूं और तुम मज़ाक बना रहे हो।"

रघु ने मेरा हाथ पकड़ा और गंभीरता से कहा,
"काव्या, तुम्हारा गुस्सा और प्यार दोनों मेरे लिए जरूरी हैं। तुम्हारे बिना ये घर सिर्फ एक मकान है। हमारी ये छोटी-छोटी नोक-झोंक ही हमारे रिश्ते को खास बनाती हैं। और जहाँ तक रोमांस की बात है, तुम बस इशारा करो, तुम्हारा रघु सब भूलकर तुम्हारे साथ वक्त बिताने को तैयार है।"

उसकी बातों ने मेरी आंखें नम कर दीं। मैंने मुस्कुराते हुए कहा,
"तुमसे बहस में कोई जीत नहीं सकता। लेकिन याद रखना, रिश्ते में नोक-झोंक ठीक है, बस प्यार और सम्मान की मिठास बनी रहनी चाहिए।"

रघु ने फिर मजाकिया लहजे में कहा,
"तो आज से मैं तुम्हें 'किचन की रानी' कहूंगा और तुम मुझे 'ड्राइंग रूम का राजा'।"

मैं हंस पड़ी।
"चलो, ये भी ठीक है। पर राजा जी, रात को मत भूलना। बच्चों को जल्दी सुलाना है।"

उस दिन हमारा घर फिर से जी उठा। वो नोक-झोंक, वो प्यार, और वो सम्मान... सबकुछ जैसे वापस आ गया।






जब मेरी  #शादी हुई,, तो मुझसे ये कहा गया कि अपने  #पति के सामने हमेशा घो*ड़ी बनकर रहना,, रातभर अपने पति को सं*भोग सुख दे...
05/10/2025

जब मेरी #शादी हुई,, तो मुझसे ये कहा गया कि अपने #पति के सामने हमेशा घो*ड़ी बनकर रहना,, रातभर अपने पति को सं*भोग सुख देना,, अपने पति को शारीरिक और मानसिक तौर पर सुख देना ही तुम्हारा कर्तव्य है,,,,

लेकिन जब शादी हुई तो पता चला की भारत में एक लड़की की शादी सिर्फ एक लड़के से नही होती, बल्कि एक पूरे परिवार से होती है जिसमे सास ससुर, ननद देवर
और सबसे अंत में पति आते हैं

अब जब मैने इसे महसूस किया तो डर गई की अपने आप से मैं खुद तो संभालती नही हूं 4 5 लोगो को कैसे संभालूंगी

जैसे तैसे मेरी शादी हुई और एक नए परिवार ने मुझे अपनाया जिंदगी पूरी तरह बदल गईं एक ही रात में मैं घर की लड़की से किसी के घर की बहु बन गई,
मैने अपनी सहेलियों में देखा था की शादी के तुरंत बाद ही उनका और उनके ससुराल वालों से झगड़ा होने लगता था मैं कभी भी नहीं चाहती थी की मेरे साथ भी ऐसा हो

शादी के कुछ दिन सब ठीक चला लेकिन कुछ समय बाद। घर के लोगो की नजर में मैं खटकने लगी थी

जब मैने ये बात अपने पति से बोली तो उन्हें ने मुझे बोला
की सबसे पहले अपने दिमाग से ये निकल दो की मायका तुम्हारा घर है और ससुराल तुम्हार ससुराल
असल में ये ही तुम्हारा घर, जितना जितना खुल के रहोगी। और बाकी लोगो को समझने की कोशिश करेगी तुम्हे उतना आसानी होगी

और यही बात उन्होंने घर के बाकी सदस्यों से कही की ये इसी घर की सदस्य है अगर इससे गलती हो तो इसे समझाओ अगर इसे समझ ना आए तो डांटो
और मुझे भी बोला अगर तुम गैर होती तो घर का कोई सदस्य तुम्हे डांटेगा या समझाएगा नही

ये बात मैने भी ध्यान से सुनी और मैने कुछ काम किए

मेरी सास के साथ ज्यादा समय बिनतना शुरू किया, उन्हें समझने की कोशिश की
और मुझे समझ आया जो औरत पिछले 40 साल से घर संभाल रही थी वो कभी नहीं चाहेगी की उनसे ये हक छीन लिया जाए

इस लिए अब मुझे कुछ भी करना होता, तो मै उनसे पूछते, पता होता की वो कभी मना नहीं करेंगी लेकिन फिर भी उनसे पूछ के हर काम करती
इससे उन्हें ये एहसास हुआ की आज भी घर में उनकी कदर हो रही है
क्यों की वो बूढी हो रही थी ऐसे में उनके साधारण काम भी मैं अपनी तरफ से कर देती
अब मैं घर में सास की फेवरेट थी मेरी ननद से ज्यादा मेरी सास मुझे मानने लगी
सास खुश हुए तो वो पापा यानी मेरे ससुर से तारीफ करती सास खुश तो पापा जी भी खुश हो गए

अब बचे ननद, और देवर इनके लिए कुछ ज्यादा नही करना पड़ा बस जो इन्हे खाना हो वो बना दो और अगर कभी मन ना करे तो मम्मी जी से बोल दो फालतू खाने की डिमांड कर रहे
और इसके अलावा दोनो मुझसे छोटे हैं तो एक दोस्त जैसा व्यवहार किया धीरे धीरे सब खुश हो गए

और आज ये स्थिति है की ना तो मुझे ये फील होता है की ये मेरा ससुराल है
और ना मेरे घर वालों को की ये कही बाहर से आई है

जब परिवार का हर सदस्य खुश है तो पतिदेव भी अपने आप ही खुश और संतुष्ट रहते हैं

आजकल लड़किया शादी करती हैं और शादी के कुछ दिन बाद ही परिवार से मनमुटाव होने लगता है

यही चीज मेरे साथ भी हुई लेकिन मेरे पति के सूझ बूझ की वजह से मैने समय से पहले ही इसे रोक लिया
हमे ये चाहिए की सबसे पहले हम ये समझना चाहिए की ससुराल अपना ही अपना घर है और सास ससुर ही पूरी जिंदगी अपने साथ होंगे
घर वाले खुश होंगे तो पति अपने आप खुश होंगे
और अगर पूरा घर खुश है तो क्या बात है...!!! 💓💘💓




इतनी  #खूबसूरत थी कि सबकी नजरे उस पर टिक जाती थी,, सब उसकी सुन्दरता के कायल थे,, कुछ लोग उसके प्रति अच्छी नियत रखते,, तो...
05/10/2025

इतनी #खूबसूरत थी कि सबकी नजरे उस पर टिक जाती थी,, सब उसकी सुन्दरता के कायल थे,, कुछ लोग उसके प्रति अच्छी नियत रखते,, तो कुछ उसके लिए गंदी नियत भी रखते थे,, एक गाँव में एक किसान रहता था। किसान उम्र में बूढ़ा था, लेकिन उसकी पत्नी जवान और खूबसूरत थी। हालांकि, उसकी सोच और नजरें अक्सर सही-गलत का फर्क भूल जाती थीं। उसका स्वभाव ऐसा था कि वह अक्सर दूसरों की ओर आकर्षित होती रहती थी।

एक दिन, एक ठग ने उस महिला को अकेले घर से निकलते देखा। वह समझ गया कि महिला के इरादे ठीक नहीं हैं। उसने चालाकी से उसके पीछे जाना शुरू कर दिया। जब महिला एक सुनसान जगह पर पहुँची, तो ठग ने उसे रोका और कहा, "मेरी पत्नी का देहांत हो चुका है। मैं अकेला हूँ और तुम्हें पसंद करता हूँ। क्या तुम मेरे साथ चलोगी?"

महिला ने झिझकते हुए जवाब दिया, "अगर ऐसा है, तो मैं तुम्हारे साथ चलने के लिए तैयार हूँ। मेरा पति बूढ़ा है और अब वह मेरी देखभाल नहीं कर सकता। लेकिन मेरे पास घर में बहुत धन और गहने हैं। मैं उन्हें साथ ले आती हूँ ताकि हमारा भविष्य सुखद हो सके।"

ठग ने कहा, "यह तो बहुत अच्छा है। तुम कल सुबह यहीं आ जाओ, और हम साथ चलेंगे।"

महिला घर लौटी और अपने बूढ़े पति के सो जाने का इंतज़ार करने लगी। जब किसान गहरी नींद में चला गया, तो महिला ने सारा धन और गहनों को एक पोटली में बाँध लिया। सुबह होते ही वह उस जगह पहुँच गई जहाँ ठग ने उससे मिलने को कहा था।

दोनों वहाँ से एक साथ चल दिए। गाँव से दूर निकलते-निकलते वे एक गहरी नदी के किनारे पहुँचे। ठग ने मन ही मन सोचा, "अगर मैं इस महिला को साथ ले जाऊँगा, तो यह मेरे लिए मुसीबत बन सकती है। इससे छुटकारा पाने का यही सही मौका है।"

ठग ने महिला से कहा, "नदी बहुत गहरी है। मैं तुम्हें और इस सामान को एक साथ नहीं ले जा सकता। पहले मैं सामान को उस पार ले जाता हूँ, फिर तुम्हें अपनी पीठ पर बिठाकर ले जाऊँगा।"

महिला ने उस पर विश्वास करते हुए धन और गहनों की पोटली उसे सौंप दी। ठग ने आगे कहा, "तुम्हारे गहने और भारी कपड़े भी मुझे दे दो ताकि दूसरी बार नदी पार करना आसान हो।"

महिला ने उसकी बात मानकर अपने गहने और कपड़े भी उसे दे दिए। ठग सारा सामान लेकर नदी पार कर गया। नदी के उस पार पहुँचने के बाद वह रुकने के बजाय आगे बढ़ गया और फिर कभी लौटकर नहीं आया।

महिला नदी के किनारे अकेली, असहाय और पछतावे से भरी रह गई। उसके स्वार्थ और लालच ने उसे सब कुछ खोने पर मजबूर कर दिया।

**शिक्षा:** गलत मार्ग और स्वार्थ के कारण इंसान का नुकसान ही होता है। जीवन में सही राह पर चलना और सच्चाई के साथ रहना ही असली सुख का आधार है।

भाभी की कहानी




🎸🦋कौन  #समझाए उन्हें इतनी  #जलन  #ठीक नहीं जो ये  #कहते है हमारा  #चाल_चलन ठीक नहीं,💕💕💕💕🎸🦋 #झूठ को  #सच में  #बदलना भी  ...
05/10/2025

🎸🦋कौन #समझाए उन्हें इतनी #जलन #ठीक नहीं
जो ये #कहते है हमारा #चाल_चलन ठीक नहीं,💕💕💕💕

🎸🦋 #झूठ को #सच में #बदलना भी #हुनर है लेकिन...
अपने #ऐबो को #छुपाने का ये #फन ठीक नहीं,💕💕💕💕

🎸🦋जो #लिबासो को #बदलने का #शौक रखते थे..
#आख़िरी_वक़्त कह ना पाए कि #कफ़न ठीक नहीं..!!💕💕💕💕

💞 Good morning my Sweet Friends,💞राधे कृष्णा।🙏

शरीर की  #तलब मेरी  #लत बन गई,, जो भी औरत मेरे सामने आती,, मैं उसे अपनी गंदी नजरो से देखता,, यकीन मानो,, मेरी गंदी करतूत...
05/10/2025

शरीर की #तलब मेरी #लत बन गई,, जो भी औरत मेरे सामने आती,, मैं उसे अपनी गंदी नजरो से देखता,, यकीन मानो,, मेरी गंदी करतूतो के कारण,,घर की औरते तक सुरक्षित नहीं थी,,, से*क्स की लत ऐसी लगी कि मैने अपनी भाभी के साथ ही इसे करने का सपना देखने लगा था,,,
बाहर से देखने में सब कुछ ठीक था—जॉब, परिवार, पढ़ाई—लेकिन अंदर एक तूफान चल रहा था, जिसकी आहट किसी को नहीं थी।

मुझे से*क्स की लत लग चुकी थी… हाँ, लत।

शुरुआत वेब सीरीज़ से हुई। धीरे-धीरे वो साधारण नहीं रहीं। हर कहानी में रिश्तों को ऐसे दिखाया जाता कि मैं उसमें खुद को खोजने लगा।
भाभी–देवर जैसे पवित्र रिश्ते भी जब इन कहानियों में वासना में लिपटे हुए दिखते, तो मेरा दिमाग उन्हें हकीकत मानने लगा।

मेरी अपनी भाभी—स्मिता भाभी—वो हमेशा मुझे अपने छोटे भाई जैसा मानती थीं। मगर मेरा मन... मैं शर्मिंदा हूँ ये कहते हुए कि मैं उन्हें उसी नजर से नहीं देख पा रहा था।
हर दिन, हर रात, मेरे सपनों में वो आने लगीं… और एक दिन, हकीकत ने वो चेहरा ओढ़ लिया।

वो दिन आज भी मेरे ज़हन में एक काली तस्वीर की तरह बसा है।

घर पर कोई नहीं था। भाभी रसोई में थी।
मैं उनके पास गया और उनका हाथ पकड़ लिया।
"भाभी... बस एक बार... प्लीज़..." — ये शब्द मेरे मुंह से निकले, और मेरी आत्मा चुप हो गई।

वो डर गईं… खुद को कमरे में बंद कर लिया।
मैं वहीं दरवाज़े के बाहर खड़ा रहा।
मेरे शरीर में उत्तेजना थी, लेकिन मन पूरी तरह से टूट चुका था।

मैं रातभर सो नहीं सका। खुद से नफरत होने लगी थी।
अगले दिन मैंने अपने सबसे अच्छे दोस्त करण को सब बता दिया। उसने मुझे जज नहीं किया। बस कहा,
"भाई, तू बीमार है... गुनहगार तब होगा जब तू इससे निकलने की कोशिश नहीं करेगा।"

करण मुझे एक मनोचिकित्सक के पास ले गया।
वहाँ पता चला कि मुझे हाइपरसेक्सुअल डिसऑर्डर है।
बार-बार सेक्स से जुड़े विचार आना, खुद को कंट्रोल न कर पाना, और इंटरनेट की गंदी कहानियों का लगातार असर… ये सब मिलकर मेरे दिमाग को बीमार कर चुके थे।

मैंने थैरेपी ली। हफ्तों तक खुद को समझा।
फोन से दूरी बनाई, ध्यान लगाना शुरू किया, और सबसे ज़रूरी—मैंने खुद को माफ़ किया।

भाभी से कभी नज़रें नहीं मिला पाया।
मैंने उन्हें एक पत्र लिखा… माफ़ी माँगी। उन्होंने कभी जवाब नहीं दिया—और शायद यही मेरी सबसे बड़ी सज़ा थी।

आज मैं दूसरों को यही कहता हूँ—

> "फैंटेसी और हकीकत में फर्क करो।
जो रिश्ता तुम्हें सबसे पहले प्यार सिखाता है, उसे अपनी वासना का पात्र मत बनाओ।
सोच पर कंट्रोल खोना बीमारी हो सकती है, लेकिन इलाज लेना बहादुरी है।" भाभी की कहानी




काश की मेरी भी  #शादी करा दी होती,, तो मैं ऐसे पागलो की तरह नंगी न घूमती,,  #मर्द के स्पर्श के लिए बेचैन हूं मैं,,,,,!!!...
04/10/2025

काश की मेरी भी #शादी करा दी होती,, तो मैं ऐसे पागलो की तरह नंगी न घूमती,, #मर्द के स्पर्श के लिए बेचैन हूं मैं,,,,,!!!

24 वर्षीय एक लड़की के पिता को एक नजदीकी रिश्तेदार ने शादी के लिए एक प्रस्ताव बताया। उन्होंने कहा, "लड़का शहर में नौकरी करता है, सुंदर दिखता है, अच्छा व्यवहार है, और उसके माता-पिता भी अच्छे, पैसे वाले हैं। उम्र 25 साल है।"

लड़की के पिता ने पूछा, "कमाई कितनी है?" बिचौलिए ने बताया, "30 हजार रुपये कमाता है।" इस पर लड़की के पिता ने कहा, "शहर में 30 हजार से क्या होगा? उसकी पारिवारिक कमाई से हमें क्या लेना-देना?"

बिचौलिए ने हिम्मत नहीं हारी और एक और प्रस्ताव रखा, "एक और लड़का है, ठीकठाक दिखता है, और 50 हजार रुपये कमाता है। सिर्फ उम्र थोड़ी ज्यादा है, 28 साल का है।" लड़की के पिता बोले, "50 हजार में 1BHK फ्लैट भी खरीद सकता है क्या? मेरी बेटी को खुश कैसे रखेगा?"

फिर बिचौलिए ने एक और प्रस्ताव दिया, "लड़का ठीकठाक है, थोड़ा मोटा है, थोड़े बाल झड़े हैं, पर महीने का 1 लाख कमाता है। उम्र 32 साल है।" लड़की के पिता गुस्से में बोले, "क्या करना है इतनी पगार का? मेरी बेटी को खूबसूरत और युवा लड़का चाहिए।"

ऐसे ही बातें करते-करते 3-5 साल निकल गए। आखिरकार बिचौलिए ने कहा, "अब 30-35 साल के लड़के ही मेरे पास हैं।"

लड़की के पिता बोले, "अब कोई भी बता दो, मेरी बेटी की उम्र भी 29-30 हो रही है।"

यह घटनाएं अक्सर होती हैं। शादी में पैसा ही सबकुछ नहीं है। जब आपकी शादी हुई थी, तब क्या आप बहुत कमाते थे? आज आपके पास क्या नहीं है?

माता-पिता की इच्छाओं का भी सम्मान करें, उनके पास तजुर्बा है, वे अपने बच्चों के लिए गलत नहीं सोचते। आजकल कई अच्छे लड़के-लड़कियों के रिश्ते सिर्फ इसलिए टूट जाते हैं, क्योंकि एक छोटी नौकरी या कुछ पढ़ाई का फर्क होता है।

शादी के बाद पैसा और नौकरी तो आएंगे, लेकिन उम्र और जवानी वापस नहीं आएगी।

दहेज और दिखावा जीवन जीने का तरीका नहीं है। जीवन में रिश्तों का महत्व पैसा से कहीं ऊपर है....!!!! 💘💓💘

भाभी की कहानी





जब मेरा  #मूड नहीं करता,, तो वो मेरा  #मूड बना देती है,, कभी  #घो*ड़ी बनकर,, तो कभी और तरीके से,, वो मेरा मूड बनाने में ...
04/10/2025

जब मेरा #मूड नहीं करता,, तो वो मेरा #मूड बना देती है,, कभी #घो*ड़ी बनकर,, तो कभी और तरीके से,, वो मेरा मूड बनाने में माहिर है,, और वैसे भी मेरी शादी संभोग तक सिमट कर रह गई है, बल्कि एक कॉर्पोरेट समझौता बनती जा रही है। मर्द अपनी इच्छाओं को औरत के शरीर में खोजता है, औरत अपने प्रेम को मर्द के आलिंगन में ढूंढती है। यही से जन्म होता है कॉर्पोरेट शादी का। जी हां, आप सोच सकते हैं कि कॉर्पोरेट जॉब होती थी, लेकिन अब समय कॉर्पोरेट शादी का है।

मैं बंगलोर में एक मैरेज काउंसलर के रूप में काम करता हूं, और मेरा काम लोगों की शादी करवाना है। बड़ी कंपनियां जैसे शादी डॉट कॉम और जीवनसाथी मुझे हायर करती हैं। लेकिन समय इतनी तेजी से बदल रहा है कि शादी का पवित्र बंधन भी छोटा लगने लगा है और इसी वजह से कॉर्पोरेट शादी का जन्म होता है।

इस शादी में लड़के और लड़की की प्रोफाइल शादी वाले ऐप्स पर बनाई जाती है। पहले जहां परिवार और लड़के के चरित्र को महत्व दिया जाता था, अब लड़के की कमाई, कंपनी में शेयर, पत्नी को क्लब जाने देने की अनुमति, और अन्य मटीरियलिस्टिक चीजों को महत्व दिया जाता है। पत्नी के लिए भी खास मानदंड होते हैं जैसे फिगर सही होना चाहिए, स्तन और नितंब का आकार आदर्श होना चाहिए, अच्छी पढ़ाई और प्राइवेट जॉब होनी चाहिए।

जब लड़के और लड़की की मीटिंग होती है, तो वे फोन पर बात करते हैं और पहले ही सवाल होता है कि उन्हें संभोग कितना पसंद है, मानो जैसे शादी की बात नहीं बल्कि किसी सौदेबाजी की बात हो रही हो। मेरे क्लाइंट्स दिल्ली, बंगलोर, गुड़गांव में हैं और इसी प्रकार का खेल चल रहा है। लोग शादी कर भी लेते हैं, लेकिन ये शादी मर्यादा के परे होती है और कुछ सालों में जब उनका संभोग से मन भर जाता है, तो ये शादी सिर्फ नाम मात्र की रह जाती है।

हम ऐसे समाज में हैं जहां किसी भी ऑप्शन की कोई कमी नहीं है, लेकिन आज भी मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि सबसे सफल शादी वही होती है जो माता-पिता द्वारा चुनी जाती है या फिर वो प्रेम विवाह जो कम से कम 5 साल पुराना हो। माता-पिता द्वारा कराई गई शादी में परिवार और सभ्यता देखी जाती है।

कॉर्पोरेट शादी में सिर्फ कमाई और फिगर देखा जाता है। माता-पिता द्वारा कराई शादी में परिवार का एक अदृश्य दबाव होता है, जिसमें किसी गलती होने पर परिवार के सदस्य शादी को बचाने का प्रयास करते हैं और पति-पत्नी भी अपने रिश्तों को सुधारने का प्रयास करते हैं। लेकिन कॉर्पोरेट शादी में आप आजाद होते हैं और थोड़ी सी भी कमी होने पर आप अपनी पत्नी या पति को छोड़कर बाहर नए रिश्ते की तलाश में निकल पड़ते हैं।

यही कारण है कि दिल्ली, मुंबई, बंगलोर में काम करने वाले ज्यादातर शादीशुदा लोग गैर-मर्द और महिलाओं के साथ संबंध बढ़ा रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी को चाहिए कि वे शादी करते समय लड़के-लड़की का चरित्र, जिम्मेदारी उठाने की क्षमता और वफादारी को महत्व दें।

कॉर्पोरेट शादी के चक्कर में पड़ने से कुछ सालों तक तो आनंद मिलेगा, लेकिन उसके बाद अकेलापन और असुरक्षा महसूस होगी और मन से आप किसी को अपना नहीं बोल पाएंगे.....!!!!!! 💓💘💓💘💓💘💓💘💓💘💓

भाभी की कहानी








क्या आपने कभी सोचा है कि एक बहू अपने मायके की आदतें ससुराल में लेकर आए तो परिवार में कैसा तूफान उठ सकता है? और फिर अगर व...
04/10/2025

क्या आपने कभी सोचा है कि एक बहू अपने मायके की आदतें ससुराल में लेकर आए तो परिवार में कैसा तूफान उठ सकता है? और फिर अगर वही बहू एक दिन खुद अपनी गलती समझ ले तो रिश्तों में कैसी मिठास लौट आती है? यह कहानी आपको मजबूर कर देगी आख़िर तक पढ़ने के लिए…

उत्तर भारत के एक छोटे से कस्बे में लगभग बीस साल पहले की बात है। कस्बे के बीचोंबीच बने एक पुराने हवेली जैसे घर में रामप्रसाद अपने परिवार के साथ रहते थे। उम्र साठ साल के आसपास, पर चेहरे पर अब भी वही सख़्ती और गरिमा। उनकी पत्नी शारदा देवी, धार्मिक स्वभाव और हर त्योहार को पूरे उत्साह से मनाने वाली। इस घर की पहचान थी उसके रीति रिवाज, संस्कार और आपसी मेलजोल।

रामप्रसाद का बड़ा बेटा आकाश उम्र में लगभग बत्तीस का था और छोटा बेटा विजय पच्चीस का। आकाश की शादी पाँच साल पहले एक स्मार्ट और आत्मविश्वासी लड़की नंदिनी से हुई थी। नंदिनी पढ़ी-लिखी, बोल्ड और अपने मायके की स्वतंत्र सोच को हमेशा आगे रखने वाली। दूसरी ओर विजय की पत्नी सान्या, घर के तौर तरीकों को अपनाने में विश्वास रखने वाली, मिलनसार और हंसमुख।

शुरुआत में नंदिनी का स्वागत बड़े प्यार से किया गया। सास-ससुर, पति, देवर और ननद सबने उसे सिर आंखों पर बिठाया। मगर नंदिनी का स्वभाव एकल परिवार की आदतों से बना था। उसे हमेशा यह लगता कि इस बड़े परिवार में उसकी प्राइवेसी खत्म हो गई है। ननद या देवर उसके कमरे में आकर बातें करते तो वह चिढ़ जाती और कह देती, “मेरे मायके में तो यह सब नहीं होता।” धीरे-धीरे सब लोग उससे दूरी बनाने लगे।

उसकी सबसे बड़ी परेशानी थी घर के रीति रिवाज। पहली बार जब तीज का त्योहार आया, शारदा देवी ने कितने प्यार से उसके लिए लहरिया की साड़ी, श्रृंगार का सामान और मेहंदी मंगवाई। पर नंदिनी ने साफ मना कर दिया। बोली, “ये सब फालतू बातें हैं। मेरे मायके में यह सब नहीं होता।” शारदा देवी का दिल टूट गया, मगर उन्होंने घर की शांति के लिए कुछ नहीं कहा।

उधर आकाश ने भी कई बार समझाया, “नंदिनी, अगर तुम्हें ये सब पसंद नहीं तो मत करो, लेकिन कम से कम मम्मी का मन रखने के लिए हिस्सा तो ले लिया करो।” मगर नंदिनी हर बार तर्क देती, “मुझे बनावटीपन से नफरत है। मैं जैसी हूं वैसी हूं। मेरे मायके में भी किसी ने कभी इन बातों पर जोर नहीं दिया।”

धीरे-धीरे त्योहार आते गए और नंदिनी अपनी ही दुनिया में खोई रही। घर के बाकी लोग अपने रीति रिवाजों और खुशियों में मग्न रहते, पर नंदिनी हर बार खुद को अलग महसूस कराती। शारदा देवी ने भी हार मानकर उसके लिए कोई खास तैयारी करनी छोड़ दी और बस पैसे थमा देतीं कि अपनी मर्जी से जो लेना है ले लो।

समय बीता और विजय की शादी सान्या से हुई। सान्या आते ही घर के रंग में घुल गई। वह हर तीज-त्योहार, हर रस्म और हर रीति रिवाज में पूरे दिल से शामिल होती। सबके साथ बैठकर हंसती-खेलती। जब वह लहरिया की साड़ी पहनकर मेहंदी लगवाती तो घर का माहौल सचमुच त्यौहार जैसा हो जाता।

यह देखकर नंदिनी को खलने लगा। उसे लगा कि उसकी जगह कोई और ले रही है। खासकर जब उसने देखा कि शारदा देवी सान्या के लिए खुद बाजार जाकर तोहफे लाती हैं, जबकि उसे बस पैसे पकड़ा दिए जाते हैं। उसके भीतर ईर्ष्या पनपने लगी।

तीज का दिन फिर आया। इस बार सान्या के हाथों में मेहंदी लग रही थी। घर में ढोलक बज रही थी, गीत गाए जा रहे थे। तभी सान्या ने मासूमियत से कहा, “मम्मी जी, भाभी जी को भी बुला लीजिए। उनके हाथों में भी मेहंदी कितनी प्यारी लगेगी।”

शारदा देवी का मन तो नहीं था, लेकिन सान्या के कहने पर वह नंदिनी के कमरे में आईं। पर वहां नंदिनी पहले से ही भरी बैठी थी। बोली, “आखिर सान्या को ही इतना अटेंशन क्यों? मैं भी तो इस घर की बहू हूं।” बहस बढ़ गई। आकाश ने भी कह दिया, “नंदिनी, सान्या को सब इसलिए पूछते हैं क्योंकि वह घर को अपनाती है। तुम तो हमेशा अपने मायके का हवाला देती रही हो।”

ये शब्द नंदिनी को अंदर तक चुभ गए। वह अकेली कमरे में बैठ गई और उन शुरुआती दिनों को याद करने लगी जब इस घर ने उसे कितने प्यार से अपनाया था। उसने खुद ही सबको दूर धकेला था। उसे एहसास हुआ कि उसकी जिद और मायके की आदतों ने उसे अकेला कर दिया है।

बहुत देर तक सोचने के बाद उसने ठान लिया कि अब बदलना होगा। उसने कमरे से बाहर कदम रखा। सब लोग त्योहार की रौनक में डूबे थे। नंदिनी को देखकर पहले तो खामोशी छा गई। मगर जब उसने मुस्कुराते हुए कहा, “अगर आप सब चाहें तो मैं भी मेहंदी लगवाना चाहती हूं,” तो पूरे घर के चेहरे खिल उठे।

उस शाम नंदिनी ने पहली बार महसूस किया कि परिवार की खुशियों में शामिल होकर ही इंसान अपने रिश्तों को जी सकता है। हालांकि वह अब भी गलतियां करती थी, पर घरवालों ने उसे अपनाने का रास्ता खोल दिया था। धीरे-धीरे नंदिनी ने भी सिख लिया कि ससुराल के रीति रिवाज बोझ नहीं, बल्कि रिश्तों को जोड़ने का जरिया होते हैं।

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